'google658fd05d77029796.html' The Original Poetry
Posted on Friday, 17 November 2017


आज आँखो में नींद नहीं
पर मायी तू लोरी ना सुनाना
खुलीआँखों से सपने ना चुराना
रात केअन्धेरे में मुझे खोना नहीं है
थकन तो बहुत है, पर मुझे सोना नहीं है
उस पार सवेरा मेरा इंतज़ार कर रहा है
मैं चाँद की सवारी पर हूँ
कब बत्तियां बुझेंगी
जुगनू नहीं दिखेंगे, तारे नहीं चमकेंगे
घड़ी की सुई सा टिक-टिक करता
ये रात का सफ़र बहुत लम्बा है
उलझन सी है, पर मुझे सोना नहीं है |
हर एक गुज़रता हुआ पल कुछ कह रहा है
ना बीता हूँ, ना रुका हूँ
तेरी ज़िंदगी में क़िस्सा-क़िस्सा जुड़ रहा हूँ
मैं ख़ुद से ही बातें कर रही हूँ
या वक़्त कोई कहानी बुन रहा है
गली का चौकीदार जागने को बोल रहा है
उसे नहीं पता शायद
घूमते हुए पंखे पर टकटकी लगाये हुई 
मेरी निगाहें जाग रही हैं
पलकें भारी हो रही हैं, पर मुझे सोना नहीं है |
अभी तो बहुत से पन्ने पलटने हैं
कुछअच्छे, कुछ बुरे
कुछ भूले-बिसरे
कुछ तरो-ताज़ा
हर याद समेटी है रात के मुशायरे में
मेरी और झिंगुर की क्या खूब जुगलबंदी है
मेरे ख्याल उसकी आवाज़ बन कर 
कोई धुन सुना रहे हैं
ख़ामोशी टूट गई पर रात अभी बाकी है
मुझे उगते हुए सूरज को देखना है
इस ख्याल पर एक झपकी आकर चली गयी
करवटों की जद्दोजहद बड़ गई हैअब
आसाँ तो नहीं ये,पर मुझे सोना नहीं है।

A poem by Sudha Kripal

"I have loved the stars too fondly to be fearful of the night."
                        - Sarah Williams


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yun chhalakne na de, tu samet le
bhara hai dard, aa nigaahon mein dekh le
seene mein dafn teri ruswayi ki aag hai,
na ho yakeen to baahon me bhar ke dekh le

Penned by Prince
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Posted on Thursday, 16 November 2017

तेरे नाम को सजदे पे सजाया हुआ है 
तन्हाइयों से दामन को समेटा हुआ है
ऐ इश्क़ के खुदा, ज़रा इधर भी नज़र कर ले

तेरी खुशबू को रूह में बसाया हुआ है
इस बेरुखी को गले से लगाया हुआ है
ऐ गुज़रती हवा, तू रुख इधर कर ले

फिर तन्हाइयों से दामन को लपेटे पाया है
खुद को आज फिर ग़म समेटे पाया है
ऐ जान-ए-अदा, तू कम सितम कर ले

मोहताज हो गया है सूनापन प्यार की चाह में
दिन गुज़र भी जाते ग़र रातें न होती राह में
ऐ दीवानी वफ़ा, कुछ तो शर्म कर ले

गुज़रती रही उस राह से हर रोज़ मैं
निकलती रही मेरी हर रज़ा बस अफ़सोस में
ऐ मेरे दिल की दुआ, बस कर ख़तम कर ले

सोनिया विश्वकर्मा 



tere naam ko sajde pe sajaya hua hai
tanhaiyon se daaman ko sameta hua hai
ae ishq ke khuda, zara idhar bhi nazar kar le

teri khushboo ko rooh mein basaya hua hai
iss berukhi ko gale se lagaya hua hai
ae guzarti hawa, tu rukh idhar kar le

fir tanhaiyon se daaman ko lapete paya hai
khud ko aaj fir gham samete paya hai
ae jaan-e-adaa, tu kam sitam kar le

mohtaz ho gaya hai soonapan pyar ki chah mein
din guzar bhi jaate gar raatein na hoti raah mein
ae diwani wafa, kuch to sharam kar le

guzarti rahi uss raah se har roz main
nikalti rahi meri har raza bus afsos mein
ae mere dil ki dua, bus kar khatam kar le

A poem by Soniya Vishwakarma
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Posted on Friday, 27 October 2017


इश्क़ की रिवायत कुछ यूँ निभा बैठे
हम उसके उन्स में दामन जला बैठे 
भर के अश्क़ जब मांगी मेरे यार ने रज़ा,
हम उसी को भूल जाने की क़सम खा बैठे

कि क़ुरबतों की कब्र भर के आया था
वो क़यामत का सफर कर के आया था
कश्ती यूँ गुज़री कुछ गर्दिश के मोड़ से,
बेअदब हर भंवर पे मर के आया था

शबनम की कोख पर आशियाने नहीं बनते
ख़ंजर की नोक पर मैख़ाने नहीं बनते
होता यूँ इल्म जो अंजाम-ए-इश्क़ का,
दुष्वार-ए-दौर में दीवाने नहीं बनते

नासाज़ सी नज़्म से नग़मा चुराएं क्या
बेज़ार सी बज़्म से बाज़ी लगाएं क्या
लाख लहज़ों में लिख भी लें अल्फ़ाज़ मग़र,
जनाज़ा-ए-वक्त को जुमला थमाएं क्या

न जाने किस कैफ़ियत, किस हालात में होगा
शायद वो भी मेरी फ़िक्र में, फ़िराक में होगा
दफ़्न सीने में कर के दूर मुझसे निकला था,
जल रहा अब भी उसी इश्क़-ए-तब-ओ-ताब में होगा

उसके मसले मेरे मसलों से मुख़्तलिफ़ रहे होंगे
न जाने कितने रंज-ओ-ग़म उसने तकिये से कहे होंगे
हमें ग़म है तो बस उसकी पथराई आँख का,
वो पत्थर टूट कर हर बार उसके रुख़सार पर पड़े होंगे

जो मयस्सर न हुई, उस नादानी का क्या करें
वो ज़िक्र भी नहीं करता, हम क़ुर्बानी का क्या करें
कोई सनम की ख़ैरियत की ख़बर ही दे दे,
हम बे-फ़ज़ूल की बदनामी का क्या करें

बुझे दीपक को ही नूर-ए-आफ़ताब कह देंगे
कोरे कागज़ को हम किस्मत की किताब कह देंगे
तो क्या हुआ जो आइना हमसे रूठ गया,
हम टूटे कांच को भी पूनम का चाँद कह देंगे

मेरे फ़लक पे फ़ानूस बन के छाया तो कर
ख़यालात-ए-फर्श पर यूँ ही कभी आया तो कर
मुद्दत हुई तेरी मशरूफ़ियत को मशहूर हुए,
ख्वाबों में ही सही, महज़ दो पल कभी ज़ाया तो कर

ख़ुश्क लब तिशनगी पर आमादा तो हैं
दूर रहने का ही सही, मग़र वादा तो है
उधेड़-बुन में यूँ ही कभी ये बात उठी,
इश्क़ पूरा न सही, इश्क़ आधा तो है


The course of true love never did run smooth.
                        
                       - William Shakespeare







ishq ki riwaayat kuch yun nibhaa baithe
hum uske uns mein daaman jala baithe
bhar ke ashq jab maangi mere yar ne razaa,
hum usi ko bhul jane ki kasam kha baithe

ki qurbaton ki kabra bhar ke aaya tha
wo qayamat ka safar kar ke aaya tha
kashti yun guzri kuch gardish ke mod se,
be-adab har bhanwar pe mar ke aaya tha

shabnam ki kokh par ashiyane nahi bante
khanjar ki nok par maikhaane nahi bante
hota yun ilm jo anjaam-e-ishq ka,
dushwar-e-daur mein deewane na bante

naasaaz si nazm se naghma churayein kya
bezaar si bazm se baazi lagayein kya
lakh lehzon mein likh bhi lein alfaaz magar,
janaaza-e-waqt ko jumlah thamayein kya

na jane kis kaifiyat, kis halaat me hoga
shayad wo bhi meri fikra me, firaaq me hoga
dafn seene me karke door mujhse nikla tha,
jal raha ab bhi usi ishq-e-tab-o-taab me hoga

uske masle mere maslon se mukhtalif rahe honge
na jane kitne ranj-o-gham usne takiye se kahe honge
humein gham hai to bus uski pathrayi aankh ka,
wo patthar toot kar har baar uske rukhsar par pade honge

jo mayassar na hui, uss naadani ka kya karein
wo zikra bhi nahi karta, hum qurbaani ka kya karein
koi sanam ki khairiyat ki khabar hi de de,
hum be-fazool ki badnami ka kya karein

bujhe deepak ko hi noor-e-aftab keh denge
kore kaagaz ko hum kismat ki kitab keh denge
to kya hua jo aaina humse rooth gaya,
hum toote kaanch ko bhi poonam ka chand keh denge

mere falaq pe fanoos ban ke chhaya to kar
khayalat-e-farsh par yun hi kabhi aaya to kar
muddat hui teri mashroofiyat ko mashhoor hue,
khwabon me hi sahi, mehez do pal kabhi zaaya to kar

khushq labb tishnagi par aamada to hain
door rehne ka hi sahi, magar waada to hai
udhed-bun me yun hi kabhi ye baat uthi,
ishq poora na sahi, ishq aadha to hai

A poem by Deepak Kripal
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Posted on Sunday, 15 October 2017



Saathi, is the tragic voice of a lover who is grieving for the love he has long lost. The poem is penned by Deepak Kripal and recited by Manoj Kumar.

Relish the rhyme.
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Posted on Sunday, 1 October 2017






Zulfon ke Khanjar is a short urdu shayari written by Deepak Kripal and recited by Hina Malik in her beautiful voice. This verse explores the unrelenting love of a lover in a poetic way.

Relish the rhyme!


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Posted on Saturday, 23 September 2017






Baazar-e-Ishq is a heart touching hindi/urdu poem penned by Deepak Kripal and recited soulfully by Hina Malik.

This poem takes us to the heartbroken world of a lover who has loved and lost, dealing not only with the betrayal of the lover, but the ridicule of the world as well.


Relish the Rhyme!





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Posted on Tuesday, 12 September 2017






Bandini, a beautiful hindi poem written and recited by Sudha Kripal takes you inside the mind of a common girl, inspects her trials and tribulations, her wishes and ambitions, concluding it to a poetic end.

Relish the rhyme..!
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